जैसे गंगाजी बिना किसी स्वार्थ के समुद्र की ओर बहती हैं, वैसे ही भक्त का मन बिना किसी अपेक्षा के भगवान के चरणों की ओर बहना चाहिए।
— भगवान कपिलदेव
भक्ति तब पूर्ण होती है, जब उसमें स्वार्थ नहीं, केवल भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण हो।
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