क्या आपने कभी सोचा है कि सम्मान मिलने पर हम प्रसन्न क्यों हो जाते हैं और अपमान मिलने पर भीतर से टूट क्यों जाते हैं?
श्रीमद्भागवत हमें एक गहन आध्यात्मिक सत्य सिखाती है—संसार का सम्मान हमारे अहंकार को बाँध सकता है और अपमान हमारी सहनशीलता एवं श्रद्धा की परीक्षा ले सकता है। किंतु भगवान इन दोनों परिस्थितियों का उपयोग हमें अपने और अधिक निकट लाने के लिए करते हैं।
जब हम सम्मान में अहंकारी नहीं होते और अपमान में विचलित नहीं होते, तब हमारा विश्वास संसार पर नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की कृपा पर टिकने लगता है। यही आध्यात्मिक परिपक्वता का आरम्भ है।
याद रखिए—
"संसार आपको सम्मान देकर बाँधता है और अपमान देकर परखता है; भगवान दोनों के माध्यम से आपको अपने निकट लाते हैं।"
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