संसार में रहिए, लेकिन संसार को अपने भीतर मत बसाइए
हम संसार से भागने के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को निभाते हुए अपने मन को भगवान से जोड़ने के लिए इस जीवन में आए हैं।
परिवार, नौकरी, व्यवसाय, धन और संबंध—इन सबका होना गलत नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब ये साधन हमारे जीवन के स्वामी बन जाते हैं और हमारा मन इनके सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान के पीछे बंध जाता है।
सच्चा वैराग्य संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए मन को आसक्ति से मुक्त रखना है।
अपने कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाइए, सफलता मिले तो अहंकार न हो, असफलता मिले तो निराशा न हो। जो कुछ प्राप्त हो, उसे भगवान की कृपा मानिए और हर परिस्थिति में भगवान की स्मृति बनाए रखिए।
संसार आपके हाथ में रहे, लेकिन आपका मन संसार के हाथ में न जाए।
यही संतुलित जीवन है—कर्तव्य संसार में, और चित्त भगवान में। 🙏
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