यह वाक्य आज के मनुष्य के जीवन की एक ऐसी सच्चाई को सामने रखता है, जिसे हम जानते हुए भी स्वीकार नहीं करना चाहते। हमारे पास संसार के लगभग हर काम के लिए समय है—धन कमाने के लिए, परिवार के लिए, व्यापार के लिए, मनोरंजन के लिए, मोबाइल और सोशल मीडिया के लिए—लेकिन जब भगवान के नाम, भजन और आत्मचिंतन की बात आती है, तो मन तुरंत कहता है—“अभी नहीं… कल से करेंगे।”
अल्प आयु कलिकाल में, मन्द बुद्धि मति हीन।
भाग्य हीन उपद्रव घिरे, जीव भयो अति दीन॥
काम काज में दिन कटे, भजन समय आलस्य।
हरि नाम नौका बिना, मिटे न भव का त्रास॥
श्रीमद्भागवतम् के प्रथम स्कंध के प्रथम अध्याय में शौनकादि ऋषि कलियुग के मनुष्य की स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं—
प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः।
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः॥
अर्थात् कलियुग में मनुष्य सामान्यतः अल्पायु, आध्यात्मिक रूप से मन्द, भ्रमित बुद्धि वाला, दुर्भाग्यशाली और अनेक प्रकार के उपद्रवों से घिरा हुआ होगा।
यह श्लोक केवल कलियुग के बाहरी जीवन का वर्णन नहीं करता, बल्कि मनुष्य के आंतरिक पतन का भी आध्यात्मिक एक्स-रे करता है।
आज मनुष्य के पास बुद्धि है, विज्ञान है, तकनीक है और सुविधाएँ हैं। वह संसार को समझने और बदलने में अद्भुत सफलता प्राप्त कर रहा है। लेकिन अपने मन को समझने और नियंत्रित करने में अभी भी संघर्ष कर रहा है।
समस्या बुद्धि की कमी नहीं है।
समस्या बुद्धि की दिशा है।
कलियुग की एक प्रमुख विशेषता बताई गई है—अल्पायु।
मनुष्य सोचता है कि जीवन अभी बहुत लंबा है। भजन बाद में कर लेंगे। पहले नौकरी कर लें, व्यापार जमा लें, घर बना लें, बच्चों की जिम्मेदारियाँ पूरी कर लें, फिर आराम से भगवान का नाम लेंगे।
लेकिन जीवन किसी को यह गारंटी नहीं देता कि उसके पास वह “बाद में” अवश्य आएगा।
समय लगातार निकल रहा है।
सुबह शाम में बदलती है, सप्ताह महीनों में और महीने वर्षों में। देखते-देखते मनुष्य जीवन के उस पड़ाव पर पहुँच जाता है जहाँ पीछे देखने पर लगता है—“इतना समय कहाँ चला गया?”
इसीलिए भक्ति को भविष्य के लिए टालना सबसे बड़ी भूलों में से एक है।
हमारे दोहे की यह पंक्ति आज के जीवन का सटीक चित्रण करती है—
काम काज में दिन कटे, भजन समय आलस्य।
मनुष्य संसार के कामों के लिए घंटों मेहनत कर सकता है। पैसे के लिए अतिरिक्त समय दे सकता है। मनोरंजन के लिए घंटों मोबाइल चला सकता है। शरीर को सुंदर बनाने के लिए जिम जा सकता है।
लेकिन भगवान के नाम के लिए कुछ मिनट बैठना कठिन लगता है।
सुबह—“आज बहुत काम है।”
शाम—“बहुत थक गया हूँ।”
रात—“कल से पक्का भजन करेंगे।”
और फिर अगले दिन वही कहानी दोहराई जाती है।
जीवन आज में बीत रहा है और भजन हमेशा कल पर टल रहा है।
मनुष्य सोचता है कि अधिक धन, अधिक सुविधा और अधिक सफलता उसे सुखी बना देगी। लेकिन एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है।
पहले भोजन चाहिए, फिर स्वाद चाहिए। सुविधा चाहिए, फिर विलास चाहिए। धन चाहिए, फिर अधिक धन चाहिए। सम्मान चाहिए, फिर दूसरों से आगे निकलने की इच्छा।
लेकिन मन की भूख समाप्त नहीं होती।
क्योंकि आत्मा की आवश्यकता भौतिक वस्तुओं से पूरी नहीं हो सकती।
हम जिस खालीपन को संसार से भरना चाहते हैं, वह वास्तव में आध्यात्मिक खालीपन है।
आत्मा भगवान से जुड़ना चाहती है।
श्रीमद्भागवतम् मनुष्य को “उपद्रुताः” भी कहता है—अर्थात् अनेक प्रकार के उपद्रवों से घिरा हुआ।
आज चिंता जीवन का सामान्य हिस्सा बनती जा रही है—भविष्य की चिंता, धन की चिंता, परिवार की चिंता, प्रतिष्ठा की चिंता और दूसरों से तुलना।
बाहर से जीवन सुविधाजनक दिखाई दे सकता है, लेकिन भीतर मन अशांत हो सकता है।
मनुष्य बाहर की परिस्थितियों को नियंत्रित करना चाहता है, लेकिन अपने मन को नियंत्रित नहीं कर पाता।
ऐसे में संसार की कोई भी सुविधा स्थायी शांति नहीं दे सकती।
इसीलिए दोहे की अंतिम पंक्ति केवल समस्या नहीं बताती, बल्कि समाधान भी देती है—
हरि नाम नौका बिना, मिटे न भव का त्रास॥
संसार का सागर अपनी लहरें उठाता रहेगा। सुख आएगा, दुःख आएगा। लाभ होगा, हानि होगी। परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी।
लेकिन हरि नाम वह आश्रय है जो मनुष्य को इन उतार-चढ़ावों के बीच भगवान की ओर ले जा सकता है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि “कलियुग इतना कठिन क्यों है?”
प्रश्न यह भी है—
“जब समाधान हमारे सामने है, तो हम उसे कल पर क्यों टाल रहे हैं?”
आयु छोटी है। समय तेजी से बीत रहा है। जीवन उपद्रवों से घिरा है और मन भटकता रहता है।
फिर भी हरि नाम हमारे पास है।
भजन को कल पर मत टालिए। जिस नाम की नौका भवसागर से पार लगा सकती है, उसे आज ही थाम लीजिए।
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